पश्चिम बंगाल की राजनीति: 2021 से 2026 तक—सत्ता, संघर्ष और संस्थागत टकराव का बदलता परिदृश्य
पश्चिम बंगाल की राजनीति पिछले पाँच वर्षों में केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह संस्थागत संघर्ष, भ्रष्टाचार के आरोप, न्यायपालिका की सक्रियता और प्रशासनिक विवादों का जटिल मिश्रण बन चुकी है। अब जब विधानसभा चुनाव 2026 में मात्र एक महीना शेष रह गया है तब अनेकों प्रश्न उभर कर सामने आ रहे हैं. 2021 के विधानसभा एवं 2024 के लोकसभा चुनावों से आज की परिस्थितियां बहुत अलग है और निष्पक्ष विश्लेषण से यह भाजपा की और झुकी हुई दिखती है. आगे हम विगत पांच वर्षों के प्रमुख घटनाक्रमों का संक्षिप्त विश्लेषण प्रस्तुत कर चुनावी संभावनाओं पर विचार करने जा रहे हैं.
वर्त्तमान रुझानों एवं राजनैतिक वास्तविकताओं को देखें तो यह स्पष्ट होता है की इस विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की नैया डगमगाती हुई दिख रही है एवं भाजपा पहली बार पश्चिम बंगाल विधानसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने जा रहे है.
1. 2021: निर्णायक विजय, लेकिन असंतुलित विपक्ष
2021 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की। भारतीय जनता पार्टी 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बनी।
इस चरण की विशेषता:
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मजबूत नेतृत्व बनाम उभरता विपक्ष
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“बाहरी बनाम बंगाली अस्मिता”
2. 2022–2024: भ्रष्टाचार और संस्थागत संकट का उदय
(क) पार्थ चटर्जी और भर्ती घोटाला
पार्थ चटर्जी की गिरफ्तारी ने राज्य की राजनीति को झकझोर दिया।
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यह मामला “Systemic corruption” का प्रतीक बन गया. स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने "तोलाबाज़ी' का संज्ञान लिया और उसके लिए हस्तक्षेप करने को मजबूर हुई.
(ख) सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
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शिक्षक भर्ती में व्यापक अनियमितताओं के कारण हजारों नियुक्तियाँ रद्द
प्रभाव:
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सरकार की विश्वसनीयता पर प्रश्न
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न्यायपालिका की बढ़ती भूमिका
3. 2024: मेडिकल कॉलेज घटना और जनभावना का बदलाव
2024 में कोलकाता मेडिकल कॉलेज से जुड़ी महिला डॉक्टर के साथ जघन्य अपराध की घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया।
इसके परिणाम:
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कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल
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डॉक्टरों का व्यापक आंदोलन
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महिलाओं की सुरक्षा एक केंद्रीय राजनीतिक मुद्दा बनी
4. 2024–2025: जनआंदोलन, सामाजिक तनाव और पहचान की राजनीति
(क) शिक्षक आंदोलन
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हजारों बर्खास्त शिक्षकों का आंदोलन
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“नौकरी बनाम न्याय” का द्वंद्व
(ख) वक्फ़ बोर्ड और भूमि/प्रशासनिक विवाद
इसी अवधि में वक्फ़ बोर्ड से जुड़े मुद्दे भी चर्चा में आए, विशेषकर भूमि प्रबंधन, अतिक्रमण, और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वक़्फ़ एक्ट के सम्बन्ध में केंद्र सरकार के निर्देशों को नहीं मानने की बात कही परन्तु अंतिम समय में उसे क्रियान्वित करने का आदेश जरी करना पड़ा.
प्रमुख बिंदु:
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वक्फ़ संपत्तियों के उपयोग और नियंत्रण को लेकर प्रश्न
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स्थानीय स्तर पर विवाद और राजनीतिक ध्रुवीकरण
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“अल्पसंख्यक अधिकार बनाम पारदर्शिता” की बहस
राजनीतिक प्रभाव:
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मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इसे अल्पसंख्यक तुष्टिकरण (appeasement) से जोड़ा
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सत्ता पक्ष ने इसे संविधानिक संरक्षण और अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया परन्तु भाजपा का पक्ष मजबूत रहा.
निष्कर्ष:
यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं रहा, बल्कि पहचान आधारित राजनीति (identity politics) का हिस्सा बन गया।(ग) सामाजिक तनाव
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विभिन्न क्षेत्रों में हिंसा और तनाव
मुर्शिदाबाद हिंसा जैसे घटनाक्रम
संकेत:
सामाजिक असंतुलन
प्रशासनिक चुनौती
5. 2025–2026: चुनावी संस्थाओं और राज्य के बीच टकराव
(क) SIR और चुनाव आयोग विवाद
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मतदाता सूची संशोधन (SIR) को लेकर विवाद
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राज्य बनाम चुनाव आयोग टकराव
(ख) सुप्रीम कोर्ट की भूमिका
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भर्ती घोटाले पर कड़ा रुख
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चुनावी प्रक्रियाओं पर निगरानी
निष्कर्ष:
न्यायपालिका अब एक निर्णायक शक्ति बन चुकी है6. 2026: ED बनाम राज्य सरकार—संस्थागत संघर्ष चरम पर
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प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई
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मुख्यमंत्री की प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की स्थिति
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:
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“असामान्य स्थिति”
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एजेंसी को कार्य करने की स्वतंत्रता
यह दर्शाता है:
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संघीय ढांचा बनाम केंद्रीय एजेंसियां
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राज्य बनाम केंद्र संघर्ष
7. समग्र विश्लेषण: तीन चरणों में बदलाव
2021 → 2024
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स्थिर सत्ता
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भ्रष्टाचार एवं उभरते मुद्दे
2024 → 2025
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जनआंदोलन
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सामाजिक व पहचान आधारित राजनीति (जिसमें वक्फ़ जैसे मुद्दे शामिल)
2025 → 2026
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संस्थागत टकराव चरम पर
8. निष्कर्ष: भविष्य की राजनीति का स्वरूप
आज पश्चिम बंगाल की राजनीति तीन ध्रुवों पर टिकी है:
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राजनीतिक शक्ति (TMC vs BJP)
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संस्थागत संघर्ष (EC, ED, Judiciary)
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जनभावना + पहचान राजनीति (नौकरी, सुरक्षा, वक्फ़, पहचान)
2026 का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि:
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विश्वास बनाम भ्रष्टाचार
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पहचान बनाम प्रशासनिक पारदर्शिता
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राज्य स्वायत्तता बनाम केंद्रीय हस्तक्षेप का निर्णायक संग्राम होगा जिसमे भाजपा स्पष्ट रूप से विजय रथ पर सवार दिख रही है.
