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Sunday, 25 December 2016

राहुल गाँधी, ९९% गरीबी का जिम्मेदार कौन?


भारत में ९९% गरीबी का जिम्मेदार कौन? राहुल गाँधी खुद जवाब दे.  कोंग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी आजकल कह रहे हैं की नोटबंदी में ९९ प्रतिशत गरीबों को नुक्सान और एक प्रतिशत अमीरों को फायदा हुआ है. यदि देश में आज भी निन्यानवे प्रतिशत जनता गरीब है तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या भारत की जनता या शासक?
और सभी जानते हैं की  स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा शासन किसने किया है?

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी 
आज़ादी के बाद के ६९ वर्षों में से कोंग्रेस ने ५४ वर्ष तक देश में साहसं किया है. इनमे से बहुत बड़े समय तक राज्यों में भी कोंग्रेस की ही सरकार रही है. सबसे बड़ी बात ये है की कोंग्रेस के शासन काल के अधिकांश समय नेहरू-गाँधी परिवार का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शासन रहा है. इस लिए यदि देश में आज भी निन्यानवे प्रतिशत लोग गरीब हैं तो इसकी जिम्मेदारी उनकी पार्टी और उनके परिवार को ही लेनी पड़ेगी. राहुल गाँधी को अपने परिवार और पार्टी की बिफलता की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए.

भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी 
स्वतंत्रता के बाद सबसे पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने, वे राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी के नाना थे. १९४७ से १९६४ में अपनी मृत्यु तक वे ही देश के प्रधान मंत्री रह. उनका कार्यकाल १७ वर्षों का रहा. उनकी मृत्यु के बाद लालबहादुर शास्त्री १९६४ से १९६६ के बीच डेढ़ साल के लिए प्रधान मंत्री बने और छोटे समय में बड़ा काम किया। यद्यपि वे कोंग्रेस के ही थे परंतु नेहरू- गाँधी परिवार का नही होने के कारन कोंग्रेस ने ही उन्हें भुला दिया।

शास्त्री जी की असामयिक एवं रहस्यमय मृत्यु के बाद पंडित नेहरू की बेटी और राहुल गाँधी की दादी इंदिरा गाँधी भारत की प्रधान मंत्री बानी और १९६६ से १९७७, ग्यारह साल तक एकछत्र राज किया। इस बीच १९७६ में उन्होंने १९ महीने के लिए देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया।  उसके बाद १९७७ में हुए आम चुनाव में इंदिरा गाँधी और उनकी कोंग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और मोरारजी देसाई देश के पहले गैरकोन्ग्रेसि प्रधानमंत्री बने. परंतु मात्र ढाई साल में ही उनकी सरकार को गिरा कर १९७९ में कोंग्रेस ने चौधरी चरण सिंह को देश का प्रधान मंत्री बना दिया। परंतु उनका कार्यकाल कुछ ही महीनों का रहा और फिर से इंदिरा गाँधी देश की प्रधान मंत्री बन गइं.

१९८० से १९८४ में अपनी मृत्यु तक वे ही प्रधान मंत्री रहीं और उसके बाद उनके बेटे और जवाहर लाल नेहरू के दोहिते राजीव गाँधी प्रधान मंत्री बने. राहुल गाँधी उन्ही राजीव गाँधी के बेटे हैं. १९८४ से १९८९ तक राजीव गाँधी प्रधान मंत्री रहे और उसके बाद के दो वर्षों में विश्वनाथ प्रताप सिंह और फिर चंद्रशेखर (कोन्ग्रेस्स के सहयोग से) देश के प्रधान मंत्री रहे. १९९१ में नरसिम्हा राव नेहरू-गाँधी परिवार के बहार के व्यक्ति के रूप में कोंग्रेसी प्रधान मंत्री बने और १९९६ तक पांच वर्ष इस पद पर बने रहे.

१९९६ से १९९८ तक अस्थिरता के दौर में देश ने दो वर्षों में तीन प्रधान मंत्री देखे अटल विहारी वाजपेयी, एच डी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल। १९९८ से २००४ तक देश को पहला गैर कोंग्रेसी प्रधान मंत्री मिला जिसने अपना एक कार्यकाल पूरा किया और वो थे अटल विहारी वाजपेयी

२००४ में संप्रग सरकार बानी जिसका नेतृत्व मनमोहन सिंह ने २०१४ तक किया। इस समय सत्ता की कुंजी पूरी तरह से राहुल गाँधी की माता सोनिया गाँधी के हाथ में थी. २०१४ में कोंग्रेस की करारी हार के बाद ही नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री बने और पिछले ढाई वर्षों से देश को विकास की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं.

नोटबंदी के बाद उत्पन्न स्थिति का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए राहुल गाँधी ने जो बयां देना शुरू किया वह अब उनकेही गले की फांस बनने जा रहा है. बगैर काम किये केवल आरोपों की राजनीती अब चलनेवाली नहीं है. ऊपर लिखे हुए तथ्य यह बताते हैं की राहुल गाँधी के अपने ही परिवार ने ३७ वर्ष तक भारत में राज किया है; नेहरू ने १७ साल, इंदिरा ने १५ साल और राजीव ने ५ साल. इसके अलावा १० वर्ष मनमोहन सिंह के जोड़ लें जिसमे अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गाँधी का ही राज था तो यह आंकड़ा ४७ वर्षों का होता है. ६९ वर्षों में से ४७ वर्ष अर्थात दो तिहाई समय तो राहुल गाँधी के परिवार को ही मिला। इसमें अन्य कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल जोड़ लें तो यह ५४ वर्ष होता है.  देश की अन्य सभी पार्टियों ने मिल कर भी अब तक केवल १५ वर्ष से भी काम शासन किया है.

अतः विचारणीय बिंदु यह है की यदि आज भी देश में निन्यानवे प्रतिशत (९९%) जनता गरीब है तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या नरेंद्र मोदी, अटल विहारी वाजपेयी या भाजपा? निश्चित रूप से नहीं। इसका दायित्व तो कोंग्रेस और खास कर नेहरू-गाँधी परिवार पर ही जाता है जो आज़ादी के बाद अधिकांश समय देश की सत्ता में रही. कालाधन और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का श्रेय भी इन्ही को जाता है जो हमेशा भ्रष्टाचार के विरोध में तो बोलते रहे पर अंदर ही अंदर उसे बढ़ावा भी देते रहे.  राहुल गाँधी को सलाह है की कुछ भी बोलने से पहले अपने गिरेवां में झांक कर देख लें बर्न ऐसे बयां तो उन्ही पर पलटवार करेंगे.

सादर,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,

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