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Monday, 26 December 2016

मोदी पर राहुल के आरोप, शीला दीक्षित ने नकारा




नरेंद्र मोदी पर पिछले कुछ दिनों से राहुल गाँधी रिश्वतखोरी के झूठे और अनर्गल आरोप लगा रहे हैं. परंतु उन्ही की कोंग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित ने उसे नकार दिया है. शीला दीक्षित दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकीं हैं और अभी कोंग्रेस की और से उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार हैं.

Sheila Dikshit denies rahul gandhi allegation on narendra modi
आरोपों को नकारते हुए शीला दीक्षित 
वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने कुछ महीने पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी द्वारा रिश्वत खाने का आरोप लगाया था. आयकर विभाग द्वारा छापेमारी के दौरान पाए गए कुछ डायरी नोट और कंप्यूटर एंट्रीज को आधार मानकर उन्होंने सहारा एवं बिड़ला परिवार से रिश्वत खाने का आरोप लगाया था. परंतु माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने इसे सबूत मानने से इनकार करते हुए उन्हें और प्रमाण पेश करने के लिए वक़्त दिया था. परंतु वे कोई नया दस्तावेज नहीं पेश कर पाए, इस पर सर्वोच्च न्यायलय के माननीय न्यायाधीशों ने उन्हें फटकार भी लगाई और सुनवाई की अगली तारिख ११ जनवरी निश्चित कर दी.

इन्ही दस्तावेजों को आधार बनाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने डेढ़ महीने पहले उसी तथ्यहीन आरोपों का इस्तेमाल प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए करना शुरू कर दिया। अपनी राजनैतिक जमीन खोने के डर से बेहाल कोंग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी फिर से उसी पुराने आरोप को पेश कर दिया। उन्होंने यह कहा था की जब मैं बोलूंगा तो भूचाल आ जायेगा, परंतु खोदा पहाड़ निकली चुहिया। उनके पास कोई नए तथ्य नहीं थे और वही पुराने घिसे पीटे बेबुनियाद आरोप जड़ दिये।

इस बचकानी हरकत से राहुल गाँधी की ही जग हसाई हुई; वैसे भी लोगों ने उन्हें गंभीरता से लेना बंद कर दिया है. परंतु इससे भी बड़ी मुश्किल उनके लिए  कोंग्रेस पार्टी की वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार शीला दीक्षित ने कड़ी कर दी है. जिन दस्तावेजों के आधार पर नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाए जा रहे हैं उन्ही में शीला दिक्षीत का भी नाम है और उन्होंने इसे आधारहीन दस्तावेज बताया है. इसका अर्थ ये हुआ की जिन दस्तावेजों को राहुल गाँधी प्रामाणिक बता रहे हैं उन्ही दस्तावेजों को शीला दीक्षित आधारहीन बता रहीं हैं.

राहुल गाँधी अपने आधारहीन आरोपों और बेबुनियाद बातों के कारण जनमानस में अपनी विश्वसनीयता और प्रासंगिकता खोते जा रहे हैं. अभी दो दिन पहले ही नोटबंदी को ९९% गरीब जनता पर आघात कह कर वे फंस चुके हैं. भारत की जनता यह पूछ रही है की राहुल गाँधी, ९९% गरीबी का जिम्मेदार कौन? उन्हें कुछ भी बोलने से पहले खासकर नरेंद्र मोदी जैसे कर्मठ, जुझारू एवं लोकप्रिय नेता पर ऊँगली उठाने से पहले कई बार सोच लेना चाहिए।

सादर,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,

#नरेंद्रमोदी #शीलादीक्षित #कोंग्रेस #उपाध्यक्ष #राहुलगाँधी #आरोप 

Sunday, 25 December 2016

राहुल गाँधी, ९९% गरीबी का जिम्मेदार कौन?


भारत में ९९% गरीबी का जिम्मेदार कौन? राहुल गाँधी खुद जवाब दे.  कोंग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी आजकल कह रहे हैं की नोटबंदी में ९९ प्रतिशत गरीबों को नुक्सान और एक प्रतिशत अमीरों को फायदा हुआ है. यदि देश में आज भी निन्यानवे प्रतिशत जनता गरीब है तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या भारत की जनता या शासक?
और सभी जानते हैं की  स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा शासन किसने किया है?

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी 
आज़ादी के बाद के ६९ वर्षों में से कोंग्रेस ने ५४ वर्ष तक देश में साहसं किया है. इनमे से बहुत बड़े समय तक राज्यों में भी कोंग्रेस की ही सरकार रही है. सबसे बड़ी बात ये है की कोंग्रेस के शासन काल के अधिकांश समय नेहरू-गाँधी परिवार का ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष शासन रहा है. इस लिए यदि देश में आज भी निन्यानवे प्रतिशत लोग गरीब हैं तो इसकी जिम्मेदारी उनकी पार्टी और उनके परिवार को ही लेनी पड़ेगी. राहुल गाँधी को अपने परिवार और पार्टी की बिफलता की जिम्मेदारी लेनी ही चाहिए.

भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी 
स्वतंत्रता के बाद सबसे पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने, वे राहुल गाँधी के पिता राजीव गाँधी के नाना थे. १९४७ से १९६४ में अपनी मृत्यु तक वे ही देश के प्रधान मंत्री रह. उनका कार्यकाल १७ वर्षों का रहा. उनकी मृत्यु के बाद लालबहादुर शास्त्री १९६४ से १९६६ के बीच डेढ़ साल के लिए प्रधान मंत्री बने और छोटे समय में बड़ा काम किया। यद्यपि वे कोंग्रेस के ही थे परंतु नेहरू- गाँधी परिवार का नही होने के कारन कोंग्रेस ने ही उन्हें भुला दिया।

शास्त्री जी की असामयिक एवं रहस्यमय मृत्यु के बाद पंडित नेहरू की बेटी और राहुल गाँधी की दादी इंदिरा गाँधी भारत की प्रधान मंत्री बानी और १९६६ से १९७७, ग्यारह साल तक एकछत्र राज किया। इस बीच १९७६ में उन्होंने १९ महीने के लिए देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया।  उसके बाद १९७७ में हुए आम चुनाव में इंदिरा गाँधी और उनकी कोंग्रेस पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा और मोरारजी देसाई देश के पहले गैरकोन्ग्रेसि प्रधानमंत्री बने. परंतु मात्र ढाई साल में ही उनकी सरकार को गिरा कर १९७९ में कोंग्रेस ने चौधरी चरण सिंह को देश का प्रधान मंत्री बना दिया। परंतु उनका कार्यकाल कुछ ही महीनों का रहा और फिर से इंदिरा गाँधी देश की प्रधान मंत्री बन गइं.

१९८० से १९८४ में अपनी मृत्यु तक वे ही प्रधान मंत्री रहीं और उसके बाद उनके बेटे और जवाहर लाल नेहरू के दोहिते राजीव गाँधी प्रधान मंत्री बने. राहुल गाँधी उन्ही राजीव गाँधी के बेटे हैं. १९८४ से १९८९ तक राजीव गाँधी प्रधान मंत्री रहे और उसके बाद के दो वर्षों में विश्वनाथ प्रताप सिंह और फिर चंद्रशेखर (कोन्ग्रेस्स के सहयोग से) देश के प्रधान मंत्री रहे. १९९१ में नरसिम्हा राव नेहरू-गाँधी परिवार के बहार के व्यक्ति के रूप में कोंग्रेसी प्रधान मंत्री बने और १९९६ तक पांच वर्ष इस पद पर बने रहे.

१९९६ से १९९८ तक अस्थिरता के दौर में देश ने दो वर्षों में तीन प्रधान मंत्री देखे अटल विहारी वाजपेयी, एच डी देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल। १९९८ से २००४ तक देश को पहला गैर कोंग्रेसी प्रधान मंत्री मिला जिसने अपना एक कार्यकाल पूरा किया और वो थे अटल विहारी वाजपेयी

२००४ में संप्रग सरकार बानी जिसका नेतृत्व मनमोहन सिंह ने २०१४ तक किया। इस समय सत्ता की कुंजी पूरी तरह से राहुल गाँधी की माता सोनिया गाँधी के हाथ में थी. २०१४ में कोंग्रेस की करारी हार के बाद ही नरेंद्र मोदी देश के प्रधान मंत्री बने और पिछले ढाई वर्षों से देश को विकास की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं.

नोटबंदी के बाद उत्पन्न स्थिति का राजनैतिक फायदा उठाने के लिए राहुल गाँधी ने जो बयां देना शुरू किया वह अब उनकेही गले की फांस बनने जा रहा है. बगैर काम किये केवल आरोपों की राजनीती अब चलनेवाली नहीं है. ऊपर लिखे हुए तथ्य यह बताते हैं की राहुल गाँधी के अपने ही परिवार ने ३७ वर्ष तक भारत में राज किया है; नेहरू ने १७ साल, इंदिरा ने १५ साल और राजीव ने ५ साल. इसके अलावा १० वर्ष मनमोहन सिंह के जोड़ लें जिसमे अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया गाँधी का ही राज था तो यह आंकड़ा ४७ वर्षों का होता है. ६९ वर्षों में से ४७ वर्ष अर्थात दो तिहाई समय तो राहुल गाँधी के परिवार को ही मिला। इसमें अन्य कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल जोड़ लें तो यह ५४ वर्ष होता है.  देश की अन्य सभी पार्टियों ने मिल कर भी अब तक केवल १५ वर्ष से भी काम शासन किया है.

अतः विचारणीय बिंदु यह है की यदि आज भी देश में निन्यानवे प्रतिशत (९९%) जनता गरीब है तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या नरेंद्र मोदी, अटल विहारी वाजपेयी या भाजपा? निश्चित रूप से नहीं। इसका दायित्व तो कोंग्रेस और खास कर नेहरू-गाँधी परिवार पर ही जाता है जो आज़ादी के बाद अधिकांश समय देश की सत्ता में रही. कालाधन और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का श्रेय भी इन्ही को जाता है जो हमेशा भ्रष्टाचार के विरोध में तो बोलते रहे पर अंदर ही अंदर उसे बढ़ावा भी देते रहे.  राहुल गाँधी को सलाह है की कुछ भी बोलने से पहले अपने गिरेवां में झांक कर देख लें बर्न ऐसे बयां तो उन्ही पर पलटवार करेंगे.

सादर,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,

#राहुल गाँधी, #गरीबी #जिम्मेदार #नोटबंदी, #नरेंद्र मोदी #अटल #विहारी #वाजपेयी #नेहरू-गाँधी #परिवार


Sunday, 4 December 2016

भारत में नोटबंदी को व्यापक जनसमर्थन


भारत में नोटबंदी को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा हैप्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के इस कदम की देश-विदेश में सभी जगह सराहना हो रही है. विरोधी दल बौखलाहट में ऊलजलूल वक्तव्य दे रहे हैं और संसद को ठप कर देश का बेसकीमती धन और समय बर्बाद कर रहे हैं. कोंग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों का भारत बंद का आह्वान निष्फल हो गया और उन्हें कहीं भी जनसमर्थन नहीं मिल पाया। देश की जनता प्रधान मंत्री के इस फैसले के साथ पूरी तरह कड़ी है और विरोधी दलों को अपनी राजनैतिक जमीन खिसकते हुए दिख रही है. 




देश की जनता को भरोसा है की नरेंद्र मोदी कालेधन को जड़ से समाप्त करने के लिए कटिवद्ध हैं और कालेधन को अपने हथियार बनाने वाले राजनैतिक दलों को वो सबक सीखना चाहती है. राजनैतिक दलों में भी सबसे ज्यादा बौखलाहट आम आदमी पार्टी (अरविन्द केजरीवाल), तृणमूल कोंग्रेस(ममता बनर्जी), बहुजन समाज पार्टी (मायावती) में देखी जा सकती है. वामदलों ने तो बौखलाहट में भारत बंद का ही आह्वान कर डाला जो किसी भी प्रकार से सफल नहीं रहा. केवल केरल, जहाँ उनकी सत्ता है वहां इसे कुछ सफलता मिली। कोंग्रेस पार्टी का तो और भी बुरा हाल है, उसे समझ ही नहीं आ रहा की नोटबंदी के इस कदम का समर्थन करे या विरोध! 




पांच सौ और हज़ार के नोट बंद करने के फैसले के अगले दिन से ही नोटबंदी के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा प्रारम्भ की थी और इससे होनेवाले फायदों से लोगों को अवगत कराना शुरू किया था. अब तक इन लेखों को हज़ारों लोगों ने पढ़ा है और सोसल मिडिया में शेयर भी किया है. अभी आगे भी इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाती रहेगी। 

कृपया इन लेखों को पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएं। 
५००, १००० के नोट बंद होने का भारत की अर्थनीति पे असर

जाली नोट होंगे बाहर, घटेगा कालाधन: नोट बंद होने का असर

नोट बंद होने का असर: जनधन व अन्य बैंक खातों में बढ़ेगा लेनदेन

नोटबंदी से घटेगी मुद्रास्फीति और महंगाई

नोटबंदी से जमीन जायदादों की कीमत और कम होगी

नोटबंदी से नशाबंदी, सट्टे के कारोबार पे रोक


सादर,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
#पांचसौ #हज़ार #नोट, #भारत #नोटबंदी #विरोधीदल #समर्थन #संसद #ठप

Friday, 28 October 2016

चीन की बौखलाहट: बहिष्कार से भारत को होगा बड़ा लाभ


भारत ने चीन के सामान का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है और इससे चीन बौखला गया है. भारतीयों द्वारा लगातार किये जा रहे चीनी समानों के बहिष्कार को चीनी मिडिया प्रमुखता से छाप रहा है. साथ ही चीन अपने चिरपरिचित अंदाज़ में धमकियाँ भी दे रहा है और यह भी कह रहा है की इससे चीन को कोई फर्क नहीं पड़ेगा परंतु भारत को ही नुक्सान होगा। इस बात से ही चीन की बौखलाहट साफ़ नज़र आ रही है. पर इससे भारत को बड़ा लाभ होगा और चीन को नुकसान।

भारतीय उत्पादों से सजी दुकान 

भारत अपने कुल आयात का १६ प्रतिशत चीन से आयात करता है जबकि चीन के कुल निर्यात (जो की काफी बड़ा है) का केवल दो प्रतिशत भारत को होता है. एक अनुमान के अनुसार भारत में चीनी माल की बिक्री में लगभग तीस प्रतिशत की कमी आई है. आंकड़ों के लिहाज़ से देखें तो चीन के कुल निर्यात का यह मात्र ०.६ प्रतिशत है; ऐसी स्थिति में चीन यह दर्शा रहा है की इससे उसकी अर्थनीति को कोई बड़ा नुक्सान नहीं हो रहा है. सतही रूप से यह बात सही भी लगती है, परंतु बात इतनी सीधी नहीं है.

आइये देखते और समझते हैं बहिष्कार का अर्थशास्त्र जिससे चीन की बौखलाहट और भारत के लाभ की अर्थनीति भी समझ में आएगी। चीन भारत को प्रतिवर्ष लगभग ४ लाख करोड़ रुपये या ६० अरब डॉलर का निर्यात करता है जबकि भारत से उसका आयात मात्र ५३ हज़ार करोड़ का है इस प्रकार भारत को चीन का शुद्ध निर्यात करीब साढ़े तीन लाख करोड़ का होता है. चीन के कुल २३०० अरब डॉलर के निर्यात में भारत को किये गए उसके निर्यात का प्रतिशत लगभग २ से २.५ प्रतिशत होता है.

चीनी उत्पाद 
चीन के कुल निर्यात में बड़ा प्रतिशत अमरीका, यूरोप, मध्य एशिया एवं जापान का है. परंतु इन देशों में ज्यादातर महंगे सामानों का निर्यात होता है जबकि भारत में ज्यादातर सस्ते माल का. हम यह जानते हैं की महंगे माल की तुलना में सस्ते माल के निर्माण में मजदूरी का प्रतिशत अधिक होता है  प्रायः महंगे सामान का रिजेक्सन (अपशिष्ट) भी इसमें शामिल हो जाता है. ऐसी स्थिति में सस्ते सामान के निर्माण में ज्यादा मजदूरी व ज्यादा मजदूर लगते हैं जबकि महंगे माल को बनाने में कच्चे माल व तकनीक की लागत अधिक होती है. सस्ते माल का निर्यात (जो की भारत में अधिक होता है) ज्यादा होने से ज्यादा लोगों को मजदूरी अर्थात रोजगार मिलता है और उस निर्यात में कमी आने से उसके उत्पादक श्रमिकों में बेरोजगारी का खतरा रहता है.

भारत को होनेवाले चार लाख करोड़ के निर्यात में यदि आधा मजदूरी का हो तो यह आंकड़ा लगभग दो लाख करोड़ रुपये का होता है. चीन सस्ती मजदूरी के दम पर ही इतना निर्यात कर पाता है और यदि हम भारतीय रुपये में एक चीनी मजदुर की सालाना मजदूरी एक लाख रुपये मानें तो चीन के दो करोड़ श्रमिक भारतीय निर्यात पर निर्भर हैं. भारत द्वारा किये गए आयात में तीस प्रतिशत की कमी का अर्थ है ६० लाख चीनी मजदूरों की बेरोजगारी!!! यही चीन की चिंता का सबसे बड़ा कारण है और यहीं से भारत के लिए बड़े लाभ की सम्भावना शुरू होती है.

यदि भारतीय बाजार में चीनी घुसपैठ इसी प्रकार कम होता रहे और भारतीय उपभोक्ता स्वदेशी माल की और आकर्षित हो तो यही ६० हज़ार करोड़ रुपये हिंदुस्तान के मजदूरों को मिलेंगे और एक लाख रुपये वार्षिक के हिसाब से साथ लाख हिंदुस्तानी मजदूरों को रोजगार मिल जायेगा। साथ ही एक लाख बीस हज़ार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की अतिरिक्त बचत भी होगी। भारतीय उत्पादकों की बिक्री बढ़ेगी और उनका मुनाफा भी देश में ही रहेगा। साथ ही अतिरिक्त उत्पाद का निर्यात भी हो सकता है, जो की इस लाभ को और भी बढा देगा। इससे सरकारी खजाने में भी टैक्स के रूप में अतिरिक्त आय होगी जो की विकास के छक्के को थोड़ा और तेजी से घुमा देगी। है न भारत के लिए बड़ा फायदा !!

इससे दूसरा फायदा ये होगा की भारतीय निर्माता काम लागत में माल बनाने के लिए प्रेरित होंगे और उनकी उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा जिसे वे वैश्विक प्रतिष्पर्धा में निखर कर आगे आयेंगे। "मेक इन इंडिया" और "मेक फॉर इंडिया"  कार्यक्रमो को भी इससे संबल मिलेगा।

चीन की चिंता के और भी विषय है. भारत ही नहीं चीन के अन्य कई पड़ौसी देश भी चीन की दादागिरी से त्रस्त हैं परंतु उन्हें उससे बहार निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा. भारत के बहिष्कार से प्रेरणा ले कर वे भी चीनी सामानों का बहिष्कार कर सकते हैं और इससे चीन को दोहरा झटका लग सकता है. एक और कारण भी है. २००८-०९ में १२०० अरब डॉलर का चीनी निर्यात मात्र ६ साल में लगभग दुगुना हो कर २०१५-१६ में २३४२ अरब डॉलर तक पहुच गया था परंतु २०१५-१६ में चीनी मुद्रा युयान के अवमूल्यन के बाबजूद यह घट कर २२७४ अरब ही रह गया. २०१६-१७ में यह और भी घटने का अनुमान है. भारत के बहिष्कार से यह  फासला और बड़ा भी हो सकता है.

यदि केवल सितंबर माह के आंकड़े को देखें तो २०१५ में जहाँ चीन ने २०५ अरब डॉलर का निर्यात किया था वहीँ सितंबर २०१६ में मात्र १८४ अरब डॉलर का अर्थात एक वर्ष में २१ अरब डॉलर या दस प्रतिशत की गिरावट! अप्रैल से सितंबर की छमाही में चीन ने केवल १०७५ अरब डॉलर का निर्यात किया है, यदि यह रफ़्तार बरकरार रहे तो भी २०१६-१७ में उसका निर्यात मुश्किल से २१५० अरब डॉलर तक ही पहुँच सकता है. इसमें और भी गिरावट की सम्भावना है. यह चीन को गंभीर में चिंता में डालने के लिए पर्याप्त है.

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के कारण भारत सर्कार के लिए किसी देश के उत्पादों पर प्रतिवंध लगाना कठिन है और इसलिए हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी या उनके मंत्रिमंडल के किसी भी सदस्य ने बहिष्कार के लिए कोई आह्वान नहीं किया है न ही इस सम्वन्ध में कोई वयान दिया है. परंतु यह नियम भारतीय उपभोक्ता पर लागु नहीं होते। जनता किसी भी उत्पाद को खरीदने या न खरीदने के लिए स्वतंत्र है. चीन द्वारा शत्रुतापूर्ण रवैय्या अपनाते हुए पहले NSG में भारत की सदस्यता का विरोध किया जाना और  भारत पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पकिस्तान का साथ निभाया; ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान की जनता ने चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर अपनी देश भक्ति का परिचय दिया और चीन को करारा झटका लगा. हमें ये मुहीम आगे भी जरी रखनी है और इससे भारत को बहुत बड़ा फायदा मिलनेवाला है.

पाक आतंकी मसूद अज़हर के समर्थक चीन का हो बहिष्कार

#अर्थनीति, #आयात #निर्यात, #चीनीउत्पाद #बहिष्कार, #भारत #लाभ, #भारतीय #उपभोक्ता

सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच
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Saturday, 1 October 2016

पाक आतंकी मसूद अज़हर के समर्थक चीन का हो बहिष्कार


 चीन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में फिर से पाक आतंकी मसूद अज़हर का पक्ष लिया है. मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आतंकवादी घोषित करवाने के लिए भारत ने जो प्रक्रिया शुरू की थी आज चीन ने उस पर वीटो कर दिया जिससे यह प्रस्ताव पास नहीं हो सका. अब हमें चीन में निर्मित सामानों के बहिष्कार के लिए आगे आना होगा।

आतंकवादी मसूद अज़हर 
चीन ने ऐसी हरकतें पहले भी की है. इसी वर्ष जून महीने में चीन ने भारत की NSG सदस्यता के मुद्दे पर भी अड़ंगा लगाया था और भारत की सदस्यता के रस्ते में रोड़ा अटकाया था. चीन के अलावा सभी देश भारत के NSG सदस्यता पक्ष में थे. परंतु चीन के विरोध के कारण भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य नहीं बन पाया था.

पठानकोट एवं उरी में हुए आतंकी हमले के भारत ने सख्त रुख अपनाते हुए पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया एवं इस काम में भारत को अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला।  भारत के पडोसी देशों सहित विश्वभर के देशों ने भारत के रुख  समर्थन किया एवं पाकिस्तान अलग थलग पड़ने लग गया है. इस बीच भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक करके ७ आतंकवादी कैम्पों को नष्ट कर और लगभग ५० आतंकवादियों को मर कर पाकिस्तान को उसकी नापाक हरकतों का करार जवाब दिया है. इससे पाकिस्तान की सेना, हुक्मरान, एवं आतंकवादी बौखला गए हैं.

अमरीका, ब्रिटेन, रूस जैसे प्रमुख देशों ने पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ गंभीर चेतावनी दी है. अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान एवं श्रीलंका जैसे भारत के पड़ौसी देशों ने भारत का साथ देते हुए पाकिस्तान में होनेवाले SAARC सम्मलेन का बहिष्कार किया है. जब सारी दुनिया भारत का समर्थन एवं पाकिस्तान व आतंकवाद के खिलाफ खड़ी है तब भी चीन ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में आतंकवादी मसूद अज़हर का पक्ष लिया है और उसे आतंकवादी घोषित करने के भारत के प्रस्ताव का विरोध किया है. चीन की ऐसी भारत विरोधी रुख का कड़ा जवाब देना जरुरी है.दरअसल चीन इस क्षेत्र में महाशक्ति की तरह व्यव्हार कर रहा है और भारत का लगातार शक्तिशाली होना उसे कतई पसंद नहीं आ रहा है. इसीलिए वो लगातार भारत का विरोध और पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है.

Update: अभी एक समाचार और मिला है की चीन ने ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोक दिया है जिससे तिब्बत से भारत की ओर आने वाले पानी में कमी हो जाएगी। ऐसा करके भी चीन पाकिस्तान को ही मदद पंहुचा रहा है क्योंकि आतंकवादी हमलों के वीच भारत ने सिंधु नदी जल समझौते की समीक्षा करना प्रारम्भ कर दिया है और इससे पाकिस्तान दवाव में है.

चीनी निर्यात 
China Export Treemap from MIT-Harvard Economic Observatory By R Hausmann, Cesar Hidalgo, et. al. Creative Commons Attribution-Share alike 3.0 Unported license. See permission to share at //atlas.media.mit.edu/about/permissions/ [CC BY-SA 3.0 (http://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0)], via Wikimedia Commons

चीन को सबक सीखने के लिए यह जरुरी है की उसे आर्थिक मोर्चे पर मात दी जाये। लगातार दो दशक तक तीव्र आर्थिक विकास के बाद अब उसकी अर्थनीति ढलान पर है और चीन कई प्रकार की आर्थिक समस्यायों से जूझ रहा है. निर्यात आधारित उसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक मंदी के कारन घोर संकट में है. भारत चीनी सामान का बड़ा बाज़ार है और वह यहाँ पर अरबों डॉलर का निर्यात करता है. जबकि भारत से उसका आयात तुलनात्मक रूप से काफी काम है. विश्व व्यापर संगठन के नियमों के अनुसार भारत चीन से आयात पर प्रतिवंध नहीं लगा सकता। इसलिए यहाँ के राष्ट्र भक्त नागरिकों को ही यह कदम उठाना पड़ेगा और चीनी सामान का बहिष्कार करना होगा।

यदि भारत के लोग चीनी सामान खरीदने से इनकार कर दें तो इससे चीन की अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगेगा और उसकी आर्थिक तरक्की रुक जाएगी। मंदी की मार झेल रहे चीन के लिए यह झटका सहन करना आसान नहीं होगा और उसे अपनी भारत विरोधी हरकतों से बाज आना पड़ेगा। इससे उसकी पाकिस्तान परस्त नीति को भी जोरदार झटका लगेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मौसी एवं उनकी सर्कार ने पाकिस्तान को धूल भी चटाया है और उसे करार झटका भी दिया है. अब हम राष्ट्र भक्त भारतीयों को पाकिस्तान के दोस्त चीन को सबक सीखना चाहिए. मोदी जी ने जो करना था कर दिया और आगे भी करते रहेंगे, अब हमारी बारी है की हम चीनी उत्पादों का बहिष्कार करें और चीन को सबक सिखाएं, ध्यान रखें भारत को आगे बढ़ने के लिए चीन को सबक सीखाना जरुरी है.

विशेष आग्रह
अभी नवरात्री और दीवाली हैं, चीन 3000 करोड़ की लाइट बेचती हैं. अपील है की कोई न खरीदे।

२ अक्टूबर गाँधीजी व शास्त्री जी के के जन्मदिन पर यह प्रतिज्ञा करे कि स्वदेशी अपनाएंगे। चीन को करारा जवाब देंगे।
विशेष सूचना

आज कल चीन के सामान पर Made in China नहीं लिखा होता है.  अब लिखा आता है,  Made in PRC मतलब People Republic of China.  सभी से शेयर करे. चीनी सामान का बहिष्कार करें।

आइये हम सब मिलकर राष्ट्रधर्म निभाएं!

सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच



Monday, 4 July 2016

बेलगाम वाहन चालकों को हो कड़ी सजा


Death in road accident in India
सड़क दुर्घटना में मृत्यु 

Injured and hospitalized in road accident in India
सड़क दुर्घटना में घायल 

बेलगाम वाहन  चालकों को कड़ी सजा होनी चाहिए। सड़क दुर्घटना से होनेवाले मौतों को कम करने के लिए यह कदम उठाना अति आवश्यक है.  सड़क दुर्घटनाओं में मरनेवालों की संख्या पुरे विश्व में भारत में ही सर्वाधिक है. अभी देखा जाता है की आये दिन कोई न कोई बेलगाम ट्रक, बस, गाडी या मोटर बाइक चालक किसी न किसी राहगीर को कुचल कर चला जाता है. पीड़ित व्यक्ति की या तो मौत हो जाती है या वो गम्भीर रूप से घायल हो जाता है.

भारत में गतिसीमा से अधिक पर वाहन चलाने से जुर्माना भरना पड़ता है. सामान्यतः शहरों में दुपहिया वाहन के लिए ४० एवं चार पहिया वाहन के लिए ६० किमी प्रति घंटे की रफ़्तार निश्चित है. इससे तेज गति से वाहन चलाने पर प्रायः ट्रैफिक पुलिस द्वारा चालान किया जाता है. ऐसी स्थिति में वाहन चालक या तो कुछ रिश्वत ले-दे के या फिर जुरमाना भर के बरी हो जाता है. यहाँ ख़ास बात ये है की कोई दुपहिया वाहन चालक ४० से ऊपर ४५ पर चलाये या ९० की गति से जुरमाना एक ही होता है. कणों के इस प्रावधान  में संशोधन होना चाहिए.

मान लीजिए किसी ने गति सीमा से कुछ अधेिक गति से वाहन चलाया तो उससे सामान्य जुरमाना, ज्यादा तेज चलाने पर कुछ अधिक जुर्माना और खतरनाक गति से चलाने पर कठोर दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। आमतौर पर खतरनाक गति से चलने वाले वाहन ही दुर्घटना और मौत का कारन बनते हैं. ऐसे चालकों के पकडे जाने पर लाइसेंस रद्द/ क़ैद जैसी सजा होनी चाहिए केवल जुर्माना भरना पर्याप्त नहीं।

प्रायः ये भी देखा गया है की खतरनाक गति से चलनेवाले वाहन पुलिस को धता बता कर चले जाते हैं परन्तु कानून का मामूली उल्लंघन करनेवाले पकडे जाते हैं और जुर्माना भरते हैं. इस स्थिति में परिवर्तन होना चाहिए। इसके साथ ही नाबालिगों द्वारा एवं बिना लाइसेंस वाहन चलाने पर भी कठोर निगरानी एवं सजा का प्रावधान होना चाहिए। लाइसेंस देने के तरीके को भी भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की जरुरत है जिससे वास्तव में वाहन चलाना आने पर एवं ट्रैफिक नियमों की जानकारी होने पर ही लाइसेंस दिया जाए. ओवरलोडिंग पर भी कठोर कार्यवाही होनी चाहिए

आर्थिक प्रगति के लिए शिक्षा जरुरी साक्षरता नहीं


Suggestions to PMO 9: Jobs in Organized sector vs Unorganized sector in India

सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच

Wednesday, 29 June 2016

सातवें वेतन आयोग से बढ़ेगी महंगाई और बेरोजगारी


Endless hunger of government employees #7thpaycommission

सरकारी कर्मचारियों की बढ़ती भूख  
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है. इस के असर से महंगाई और बेरोजगारी बढ़ेगी। केंद्रीय कर्मचारियों का वेतन औसतन २३.५ फ़ीसदी बधाई गई है. इससे केवल ४७ लाख वर्त्तमान एवं ५२ लाख पूर्व कर्मचारियों को लाभ होगा जबकि इसका भर देश की १२५ करोड़ जनता को उठाना पड़ेगा। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागु करने से केंद्र सरकार पर 1लाख २ हज़ार करोड़ रुपये का अतिरिक्त सालाना बोझ पड़ेगा, और यह रकम जनता से वसूले हुए टैक्स में से जायेगा।

Report 7th Pay commission 1

Report 7th Pay commission 2
इसका एक पहलु ये भी है की विकास के काम में कमी होगी। देश का वीकास अवरुद्ध होगा और GDP विकास दर में भी कमी आएगी। दुसरी ओर इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी जिसका अनिवार्य परिणाम महंगाई के रूप  में आएगा। साथ ही मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी के कारण व्याज दरें या तो  बढ़ेगी या स्थिर रहेगी; व्याज दर नहीं घटने से उद्योग-व्यापर के लिए क़र्ज़ महंगा होगा और उनके विकास दर में भी कमी आएगी। जिससे बेरोजगारी बढ़ेगी।

इसका एक दूसरा पहलु ये भी है है राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए सरकार नई नियुक्ति नहीं करेगी और इससे भी बेरोजगारी बढ़ेगी।  केंद्रीय  वेतन बढ़ने पर राज्य सरकारों में भी वेतन बढ़ने  होगी और यह दुष्चक्र फिर से तेज गति से चलेगा।

सरकारी कर्मचारियों का वेतन वैसे भी अन्य निजी कर्मचारियों की तुलना में लगभग दुगुना है. यदि असंगठित क्षेत्र की बात करें तो यह लगभग चार से पांच गुना है. वेतन के अलावा अन्य भत्ते, छुट्टियां एवं अन्य सुविधाएँ इसके अतिरिक्त है. ऐसी स्थिति में सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाना कहाँ तक वाजीव है?

पांचवें वेतन आयोग ने 52प्रतिशत और छठे वेतन आयोग  वीस प्रतिशत वेतन वृद्धि की थी. उस समय कर्मचारी संगठनों ने तत्कालीन सरकार पर दवाव डालकर इसे चालीस प्रतिशत करवा लिया था. इस तरह दोनों वेतन आयोगों का मिलाकर कुल वृद्धि ११३ प्रतिशत हो गई थी. (१००+५२ =१५२ +४०%= २१३). इस पर २३.५ प्रतिशत जोड़ने पर यह हो जाता है २६३ अर्थात १६३ प्रतिशत की वृद्धि!!!  यह नियमित वेतन वृद्धि एवं महंगाई भत्ते के अतिरिक्त है. अर्थात सरकारी कर्मचारियों को महंगाई का असर नहीं होता और ऊपर से इतनी ज्यादा वृद्धि दर!! हर सरकार लगातार सरकारी कर्मचारियों के आगे झुकती रही है और जनता जागरूक नहीं हुई तो आगे भी झुकती रहेगी। सबसे बड़ी बात ये है सरकारी कर्मचारी इस बढ़ोतरी से भी संतुष्ट नहीं हैं और हड़ताल पर जाने की धमकी दे रहे हैं.

सामान्य जनता तो सरकारी कर्मचारियों के रवैय्ये से वैसे ही नाखुश है, उन्हें लगता है की वे काम तो कम करते हैं और वेतन-सुविधाएँ अधिक लेते हैं. अब जनता को ही जागरूक हो कर इस प्रवृत्ति का मुखर विरोध करना होगा और अपने जन-प्रतिनिधियों को इसके विरुद्ध संसद और विधान सभाओं में आवाज उठने के लिए मजबूर करना होगा।

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सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच

फोटो: By மா.ராஜ் (Own work) [CC BY-SA 4.0 (http://creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0)], via Wikimedia Commons