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Sunday, 4 December 2016

भारत में नोटबंदी को व्यापक जनसमर्थन


भारत में नोटबंदी को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा हैप्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के इस कदम की देश-विदेश में सभी जगह सराहना हो रही है. विरोधी दल बौखलाहट में ऊलजलूल वक्तव्य दे रहे हैं और संसद को ठप कर देश का बेसकीमती धन और समय बर्बाद कर रहे हैं. कोंग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों का भारत बंद का आह्वान निष्फल हो गया और उन्हें कहीं भी जनसमर्थन नहीं मिल पाया। देश की जनता प्रधान मंत्री के इस फैसले के साथ पूरी तरह कड़ी है और विरोधी दलों को अपनी राजनैतिक जमीन खिसकते हुए दिख रही है. 




देश की जनता को भरोसा है की नरेंद्र मोदी कालेधन को जड़ से समाप्त करने के लिए कटिवद्ध हैं और कालेधन को अपने हथियार बनाने वाले राजनैतिक दलों को वो सबक सीखना चाहती है. राजनैतिक दलों में भी सबसे ज्यादा बौखलाहट आम आदमी पार्टी (अरविन्द केजरीवाल), तृणमूल कोंग्रेस(ममता बनर्जी), बहुजन समाज पार्टी (मायावती) में देखी जा सकती है. वामदलों ने तो बौखलाहट में भारत बंद का ही आह्वान कर डाला जो किसी भी प्रकार से सफल नहीं रहा. केवल केरल, जहाँ उनकी सत्ता है वहां इसे कुछ सफलता मिली। कोंग्रेस पार्टी का तो और भी बुरा हाल है, उसे समझ ही नहीं आ रहा की नोटबंदी के इस कदम का समर्थन करे या विरोध! 




पांच सौ और हज़ार के नोट बंद करने के फैसले के अगले दिन से ही नोटबंदी के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा प्रारम्भ की थी और इससे होनेवाले फायदों से लोगों को अवगत कराना शुरू किया था. अब तक इन लेखों को हज़ारों लोगों ने पढ़ा है और सोसल मिडिया में शेयर भी किया है. अभी आगे भी इसके विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की जाती रहेगी। 

कृपया इन लेखों को पढ़ें और अपने विचारों से अवगत कराएं। 
५००, १००० के नोट बंद होने का भारत की अर्थनीति पे असर

जाली नोट होंगे बाहर, घटेगा कालाधन: नोट बंद होने का असर

नोट बंद होने का असर: जनधन व अन्य बैंक खातों में बढ़ेगा लेनदेन

नोटबंदी से घटेगी मुद्रास्फीति और महंगाई

नोटबंदी से जमीन जायदादों की कीमत और कम होगी

नोटबंदी से नशाबंदी, सट्टे के कारोबार पे रोक


सादर,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
#पांचसौ #हज़ार #नोट, #भारत #नोटबंदी #विरोधीदल #समर्थन #संसद #ठप

Friday, 28 October 2016

चीन की बौखलाहट: बहिष्कार से भारत को होगा बड़ा लाभ


भारत ने चीन के सामान का बहिष्कार करना शुरू कर दिया है और इससे चीन बौखला गया है. भारतीयों द्वारा लगातार किये जा रहे चीनी समानों के बहिष्कार को चीनी मिडिया प्रमुखता से छाप रहा है. साथ ही चीन अपने चिरपरिचित अंदाज़ में धमकियाँ भी दे रहा है और यह भी कह रहा है की इससे चीन को कोई फर्क नहीं पड़ेगा परंतु भारत को ही नुक्सान होगा। इस बात से ही चीन की बौखलाहट साफ़ नज़र आ रही है. पर इससे भारत को बड़ा लाभ होगा और चीन को नुकसान।

भारतीय उत्पादों से सजी दुकान 

भारत अपने कुल आयात का १६ प्रतिशत चीन से आयात करता है जबकि चीन के कुल निर्यात (जो की काफी बड़ा है) का केवल दो प्रतिशत भारत को होता है. एक अनुमान के अनुसार भारत में चीनी माल की बिक्री में लगभग तीस प्रतिशत की कमी आई है. आंकड़ों के लिहाज़ से देखें तो चीन के कुल निर्यात का यह मात्र ०.६ प्रतिशत है; ऐसी स्थिति में चीन यह दर्शा रहा है की इससे उसकी अर्थनीति को कोई बड़ा नुक्सान नहीं हो रहा है. सतही रूप से यह बात सही भी लगती है, परंतु बात इतनी सीधी नहीं है.

आइये देखते और समझते हैं बहिष्कार का अर्थशास्त्र जिससे चीन की बौखलाहट और भारत के लाभ की अर्थनीति भी समझ में आएगी। चीन भारत को प्रतिवर्ष लगभग ४ लाख करोड़ रुपये या ६० अरब डॉलर का निर्यात करता है जबकि भारत से उसका आयात मात्र ५३ हज़ार करोड़ का है इस प्रकार भारत को चीन का शुद्ध निर्यात करीब साढ़े तीन लाख करोड़ का होता है. चीन के कुल २३०० अरब डॉलर के निर्यात में भारत को किये गए उसके निर्यात का प्रतिशत लगभग २ से २.५ प्रतिशत होता है.

चीनी उत्पाद 
चीन के कुल निर्यात में बड़ा प्रतिशत अमरीका, यूरोप, मध्य एशिया एवं जापान का है. परंतु इन देशों में ज्यादातर महंगे सामानों का निर्यात होता है जबकि भारत में ज्यादातर सस्ते माल का. हम यह जानते हैं की महंगे माल की तुलना में सस्ते माल के निर्माण में मजदूरी का प्रतिशत अधिक होता है  प्रायः महंगे सामान का रिजेक्सन (अपशिष्ट) भी इसमें शामिल हो जाता है. ऐसी स्थिति में सस्ते सामान के निर्माण में ज्यादा मजदूरी व ज्यादा मजदूर लगते हैं जबकि महंगे माल को बनाने में कच्चे माल व तकनीक की लागत अधिक होती है. सस्ते माल का निर्यात (जो की भारत में अधिक होता है) ज्यादा होने से ज्यादा लोगों को मजदूरी अर्थात रोजगार मिलता है और उस निर्यात में कमी आने से उसके उत्पादक श्रमिकों में बेरोजगारी का खतरा रहता है.

भारत को होनेवाले चार लाख करोड़ के निर्यात में यदि आधा मजदूरी का हो तो यह आंकड़ा लगभग दो लाख करोड़ रुपये का होता है. चीन सस्ती मजदूरी के दम पर ही इतना निर्यात कर पाता है और यदि हम भारतीय रुपये में एक चीनी मजदुर की सालाना मजदूरी एक लाख रुपये मानें तो चीन के दो करोड़ श्रमिक भारतीय निर्यात पर निर्भर हैं. भारत द्वारा किये गए आयात में तीस प्रतिशत की कमी का अर्थ है ६० लाख चीनी मजदूरों की बेरोजगारी!!! यही चीन की चिंता का सबसे बड़ा कारण है और यहीं से भारत के लिए बड़े लाभ की सम्भावना शुरू होती है.

यदि भारतीय बाजार में चीनी घुसपैठ इसी प्रकार कम होता रहे और भारतीय उपभोक्ता स्वदेशी माल की और आकर्षित हो तो यही ६० हज़ार करोड़ रुपये हिंदुस्तान के मजदूरों को मिलेंगे और एक लाख रुपये वार्षिक के हिसाब से साथ लाख हिंदुस्तानी मजदूरों को रोजगार मिल जायेगा। साथ ही एक लाख बीस हज़ार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की अतिरिक्त बचत भी होगी। भारतीय उत्पादकों की बिक्री बढ़ेगी और उनका मुनाफा भी देश में ही रहेगा। साथ ही अतिरिक्त उत्पाद का निर्यात भी हो सकता है, जो की इस लाभ को और भी बढा देगा। इससे सरकारी खजाने में भी टैक्स के रूप में अतिरिक्त आय होगी जो की विकास के छक्के को थोड़ा और तेजी से घुमा देगी। है न भारत के लिए बड़ा फायदा !!

इससे दूसरा फायदा ये होगा की भारतीय निर्माता काम लागत में माल बनाने के लिए प्रेरित होंगे और उनकी उत्पादकता और गुणवत्ता दोनों में सुधार होगा जिसे वे वैश्विक प्रतिष्पर्धा में निखर कर आगे आयेंगे। "मेक इन इंडिया" और "मेक फॉर इंडिया"  कार्यक्रमो को भी इससे संबल मिलेगा।

चीन की चिंता के और भी विषय है. भारत ही नहीं चीन के अन्य कई पड़ौसी देश भी चीन की दादागिरी से त्रस्त हैं परंतु उन्हें उससे बहार निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा. भारत के बहिष्कार से प्रेरणा ले कर वे भी चीनी सामानों का बहिष्कार कर सकते हैं और इससे चीन को दोहरा झटका लग सकता है. एक और कारण भी है. २००८-०९ में १२०० अरब डॉलर का चीनी निर्यात मात्र ६ साल में लगभग दुगुना हो कर २०१५-१६ में २३४२ अरब डॉलर तक पहुच गया था परंतु २०१५-१६ में चीनी मुद्रा युयान के अवमूल्यन के बाबजूद यह घट कर २२७४ अरब ही रह गया. २०१६-१७ में यह और भी घटने का अनुमान है. भारत के बहिष्कार से यह  फासला और बड़ा भी हो सकता है.

यदि केवल सितंबर माह के आंकड़े को देखें तो २०१५ में जहाँ चीन ने २०५ अरब डॉलर का निर्यात किया था वहीँ सितंबर २०१६ में मात्र १८४ अरब डॉलर का अर्थात एक वर्ष में २१ अरब डॉलर या दस प्रतिशत की गिरावट! अप्रैल से सितंबर की छमाही में चीन ने केवल १०७५ अरब डॉलर का निर्यात किया है, यदि यह रफ़्तार बरकरार रहे तो भी २०१६-१७ में उसका निर्यात मुश्किल से २१५० अरब डॉलर तक ही पहुँच सकता है. इसमें और भी गिरावट की सम्भावना है. यह चीन को गंभीर में चिंता में डालने के लिए पर्याप्त है.

विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के कारण भारत सर्कार के लिए किसी देश के उत्पादों पर प्रतिवंध लगाना कठिन है और इसलिए हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी या उनके मंत्रिमंडल के किसी भी सदस्य ने बहिष्कार के लिए कोई आह्वान नहीं किया है न ही इस सम्वन्ध में कोई वयान दिया है. परंतु यह नियम भारतीय उपभोक्ता पर लागु नहीं होते। जनता किसी भी उत्पाद को खरीदने या न खरीदने के लिए स्वतंत्र है. चीन द्वारा शत्रुतापूर्ण रवैय्या अपनाते हुए पहले NSG में भारत की सदस्यता का विरोध किया जाना और  भारत पर हुए आतंकवादी हमले के बाद पकिस्तान का साथ निभाया; ऐसी स्थिति में हिंदुस्तान की जनता ने चीनी उत्पादों का बहिष्कार कर अपनी देश भक्ति का परिचय दिया और चीन को करारा झटका लगा. हमें ये मुहीम आगे भी जरी रखनी है और इससे भारत को बहुत बड़ा फायदा मिलनेवाला है.

पाक आतंकी मसूद अज़हर के समर्थक चीन का हो बहिष्कार

#अर्थनीति, #आयात #निर्यात, #चीनीउत्पाद #बहिष्कार, #भारत #लाभ, #भारतीय #उपभोक्ता

सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच
आगे पढ़ें



Saturday, 1 October 2016

पाक आतंकी मसूद अज़हर के समर्थक चीन का हो बहिष्कार


 चीन ने संयुक्त राष्ट्र संघ में फिर से पाक आतंकी मसूद अज़हर का पक्ष लिया है. मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा आतंकवादी घोषित करवाने के लिए भारत ने जो प्रक्रिया शुरू की थी आज चीन ने उस पर वीटो कर दिया जिससे यह प्रस्ताव पास नहीं हो सका. अब हमें चीन में निर्मित सामानों के बहिष्कार के लिए आगे आना होगा।

आतंकवादी मसूद अज़हर 
चीन ने ऐसी हरकतें पहले भी की है. इसी वर्ष जून महीने में चीन ने भारत की NSG सदस्यता के मुद्दे पर भी अड़ंगा लगाया था और भारत की सदस्यता के रस्ते में रोड़ा अटकाया था. चीन के अलावा सभी देश भारत के NSG सदस्यता पक्ष में थे. परंतु चीन के विरोध के कारण भारत परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह का सदस्य नहीं बन पाया था.

पठानकोट एवं उरी में हुए आतंकी हमले के भारत ने सख्त रुख अपनाते हुए पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया एवं इस काम में भारत को अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला।  भारत के पडोसी देशों सहित विश्वभर के देशों ने भारत के रुख  समर्थन किया एवं पाकिस्तान अलग थलग पड़ने लग गया है. इस बीच भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक करके ७ आतंकवादी कैम्पों को नष्ट कर और लगभग ५० आतंकवादियों को मर कर पाकिस्तान को उसकी नापाक हरकतों का करार जवाब दिया है. इससे पाकिस्तान की सेना, हुक्मरान, एवं आतंकवादी बौखला गए हैं.

अमरीका, ब्रिटेन, रूस जैसे प्रमुख देशों ने पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ गंभीर चेतावनी दी है. अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान एवं श्रीलंका जैसे भारत के पड़ौसी देशों ने भारत का साथ देते हुए पाकिस्तान में होनेवाले SAARC सम्मलेन का बहिष्कार किया है. जब सारी दुनिया भारत का समर्थन एवं पाकिस्तान व आतंकवाद के खिलाफ खड़ी है तब भी चीन ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में आतंकवादी मसूद अज़हर का पक्ष लिया है और उसे आतंकवादी घोषित करने के भारत के प्रस्ताव का विरोध किया है. चीन की ऐसी भारत विरोधी रुख का कड़ा जवाब देना जरुरी है.दरअसल चीन इस क्षेत्र में महाशक्ति की तरह व्यव्हार कर रहा है और भारत का लगातार शक्तिशाली होना उसे कतई पसंद नहीं आ रहा है. इसीलिए वो लगातार भारत का विरोध और पाकिस्तान का समर्थन कर रहा है.

Update: अभी एक समाचार और मिला है की चीन ने ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोक दिया है जिससे तिब्बत से भारत की ओर आने वाले पानी में कमी हो जाएगी। ऐसा करके भी चीन पाकिस्तान को ही मदद पंहुचा रहा है क्योंकि आतंकवादी हमलों के वीच भारत ने सिंधु नदी जल समझौते की समीक्षा करना प्रारम्भ कर दिया है और इससे पाकिस्तान दवाव में है.

चीनी निर्यात 
China Export Treemap from MIT-Harvard Economic Observatory By R Hausmann, Cesar Hidalgo, et. al. Creative Commons Attribution-Share alike 3.0 Unported license. See permission to share at //atlas.media.mit.edu/about/permissions/ [CC BY-SA 3.0 (http://creativecommons.org/licenses/by-sa/3.0)], via Wikimedia Commons

चीन को सबक सीखने के लिए यह जरुरी है की उसे आर्थिक मोर्चे पर मात दी जाये। लगातार दो दशक तक तीव्र आर्थिक विकास के बाद अब उसकी अर्थनीति ढलान पर है और चीन कई प्रकार की आर्थिक समस्यायों से जूझ रहा है. निर्यात आधारित उसकी अर्थव्यवस्था वैश्विक मंदी के कारन घोर संकट में है. भारत चीनी सामान का बड़ा बाज़ार है और वह यहाँ पर अरबों डॉलर का निर्यात करता है. जबकि भारत से उसका आयात तुलनात्मक रूप से काफी काम है. विश्व व्यापर संगठन के नियमों के अनुसार भारत चीन से आयात पर प्रतिवंध नहीं लगा सकता। इसलिए यहाँ के राष्ट्र भक्त नागरिकों को ही यह कदम उठाना पड़ेगा और चीनी सामान का बहिष्कार करना होगा।

यदि भारत के लोग चीनी सामान खरीदने से इनकार कर दें तो इससे चीन की अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लगेगा और उसकी आर्थिक तरक्की रुक जाएगी। मंदी की मार झेल रहे चीन के लिए यह झटका सहन करना आसान नहीं होगा और उसे अपनी भारत विरोधी हरकतों से बाज आना पड़ेगा। इससे उसकी पाकिस्तान परस्त नीति को भी जोरदार झटका लगेगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मौसी एवं उनकी सर्कार ने पाकिस्तान को धूल भी चटाया है और उसे करार झटका भी दिया है. अब हम राष्ट्र भक्त भारतीयों को पाकिस्तान के दोस्त चीन को सबक सीखना चाहिए. मोदी जी ने जो करना था कर दिया और आगे भी करते रहेंगे, अब हमारी बारी है की हम चीनी उत्पादों का बहिष्कार करें और चीन को सबक सिखाएं, ध्यान रखें भारत को आगे बढ़ने के लिए चीन को सबक सीखाना जरुरी है.

विशेष आग्रह
अभी नवरात्री और दीवाली हैं, चीन 3000 करोड़ की लाइट बेचती हैं. अपील है की कोई न खरीदे।

२ अक्टूबर गाँधीजी व शास्त्री जी के के जन्मदिन पर यह प्रतिज्ञा करे कि स्वदेशी अपनाएंगे। चीन को करारा जवाब देंगे।
विशेष सूचना

आज कल चीन के सामान पर Made in China नहीं लिखा होता है.  अब लिखा आता है,  Made in PRC मतलब People Republic of China.  सभी से शेयर करे. चीनी सामान का बहिष्कार करें।

आइये हम सब मिलकर राष्ट्रधर्म निभाएं!

सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच



Monday, 4 July 2016

बेलगाम वाहन चालकों को हो कड़ी सजा


Death in road accident in India
सड़क दुर्घटना में मृत्यु 

Injured and hospitalized in road accident in India
सड़क दुर्घटना में घायल 

बेलगाम वाहन  चालकों को कड़ी सजा होनी चाहिए। सड़क दुर्घटना से होनेवाले मौतों को कम करने के लिए यह कदम उठाना अति आवश्यक है.  सड़क दुर्घटनाओं में मरनेवालों की संख्या पुरे विश्व में भारत में ही सर्वाधिक है. अभी देखा जाता है की आये दिन कोई न कोई बेलगाम ट्रक, बस, गाडी या मोटर बाइक चालक किसी न किसी राहगीर को कुचल कर चला जाता है. पीड़ित व्यक्ति की या तो मौत हो जाती है या वो गम्भीर रूप से घायल हो जाता है.

भारत में गतिसीमा से अधिक पर वाहन चलाने से जुर्माना भरना पड़ता है. सामान्यतः शहरों में दुपहिया वाहन के लिए ४० एवं चार पहिया वाहन के लिए ६० किमी प्रति घंटे की रफ़्तार निश्चित है. इससे तेज गति से वाहन चलाने पर प्रायः ट्रैफिक पुलिस द्वारा चालान किया जाता है. ऐसी स्थिति में वाहन चालक या तो कुछ रिश्वत ले-दे के या फिर जुरमाना भर के बरी हो जाता है. यहाँ ख़ास बात ये है की कोई दुपहिया वाहन चालक ४० से ऊपर ४५ पर चलाये या ९० की गति से जुरमाना एक ही होता है. कणों के इस प्रावधान  में संशोधन होना चाहिए.

मान लीजिए किसी ने गति सीमा से कुछ अधेिक गति से वाहन चलाया तो उससे सामान्य जुरमाना, ज्यादा तेज चलाने पर कुछ अधिक जुर्माना और खतरनाक गति से चलाने पर कठोर दण्ड का प्रावधान होना चाहिए। आमतौर पर खतरनाक गति से चलने वाले वाहन ही दुर्घटना और मौत का कारन बनते हैं. ऐसे चालकों के पकडे जाने पर लाइसेंस रद्द/ क़ैद जैसी सजा होनी चाहिए केवल जुर्माना भरना पर्याप्त नहीं।

प्रायः ये भी देखा गया है की खतरनाक गति से चलनेवाले वाहन पुलिस को धता बता कर चले जाते हैं परन्तु कानून का मामूली उल्लंघन करनेवाले पकडे जाते हैं और जुर्माना भरते हैं. इस स्थिति में परिवर्तन होना चाहिए। इसके साथ ही नाबालिगों द्वारा एवं बिना लाइसेंस वाहन चलाने पर भी कठोर निगरानी एवं सजा का प्रावधान होना चाहिए। लाइसेंस देने के तरीके को भी भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की जरुरत है जिससे वास्तव में वाहन चलाना आने पर एवं ट्रैफिक नियमों की जानकारी होने पर ही लाइसेंस दिया जाए. ओवरलोडिंग पर भी कठोर कार्यवाही होनी चाहिए

आर्थिक प्रगति के लिए शिक्षा जरुरी साक्षरता नहीं


Suggestions to PMO 9: Jobs in Organized sector vs Unorganized sector in India

सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच

Wednesday, 29 June 2016

सातवें वेतन आयोग से बढ़ेगी महंगाई और बेरोजगारी


Endless hunger of government employees #7thpaycommission

सरकारी कर्मचारियों की बढ़ती भूख  
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आज सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है. इस के असर से महंगाई और बेरोजगारी बढ़ेगी। केंद्रीय कर्मचारियों का वेतन औसतन २३.५ फ़ीसदी बधाई गई है. इससे केवल ४७ लाख वर्त्तमान एवं ५२ लाख पूर्व कर्मचारियों को लाभ होगा जबकि इसका भर देश की १२५ करोड़ जनता को उठाना पड़ेगा। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागु करने से केंद्र सरकार पर 1लाख २ हज़ार करोड़ रुपये का अतिरिक्त सालाना बोझ पड़ेगा, और यह रकम जनता से वसूले हुए टैक्स में से जायेगा।

Report 7th Pay commission 1

Report 7th Pay commission 2
इसका एक पहलु ये भी है की विकास के काम में कमी होगी। देश का वीकास अवरुद्ध होगा और GDP विकास दर में भी कमी आएगी। दुसरी ओर इससे मुद्रास्फीति बढ़ेगी जिसका अनिवार्य परिणाम महंगाई के रूप  में आएगा। साथ ही मुद्रास्फीति में बढ़ोतरी के कारण व्याज दरें या तो  बढ़ेगी या स्थिर रहेगी; व्याज दर नहीं घटने से उद्योग-व्यापर के लिए क़र्ज़ महंगा होगा और उनके विकास दर में भी कमी आएगी। जिससे बेरोजगारी बढ़ेगी।

इसका एक दूसरा पहलु ये भी है है राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए सरकार नई नियुक्ति नहीं करेगी और इससे भी बेरोजगारी बढ़ेगी।  केंद्रीय  वेतन बढ़ने पर राज्य सरकारों में भी वेतन बढ़ने  होगी और यह दुष्चक्र फिर से तेज गति से चलेगा।

सरकारी कर्मचारियों का वेतन वैसे भी अन्य निजी कर्मचारियों की तुलना में लगभग दुगुना है. यदि असंगठित क्षेत्र की बात करें तो यह लगभग चार से पांच गुना है. वेतन के अलावा अन्य भत्ते, छुट्टियां एवं अन्य सुविधाएँ इसके अतिरिक्त है. ऐसी स्थिति में सरकारी कर्मचारियों का वेतन बढ़ाना कहाँ तक वाजीव है?

पांचवें वेतन आयोग ने 52प्रतिशत और छठे वेतन आयोग  वीस प्रतिशत वेतन वृद्धि की थी. उस समय कर्मचारी संगठनों ने तत्कालीन सरकार पर दवाव डालकर इसे चालीस प्रतिशत करवा लिया था. इस तरह दोनों वेतन आयोगों का मिलाकर कुल वृद्धि ११३ प्रतिशत हो गई थी. (१००+५२ =१५२ +४०%= २१३). इस पर २३.५ प्रतिशत जोड़ने पर यह हो जाता है २६३ अर्थात १६३ प्रतिशत की वृद्धि!!!  यह नियमित वेतन वृद्धि एवं महंगाई भत्ते के अतिरिक्त है. अर्थात सरकारी कर्मचारियों को महंगाई का असर नहीं होता और ऊपर से इतनी ज्यादा वृद्धि दर!! हर सरकार लगातार सरकारी कर्मचारियों के आगे झुकती रही है और जनता जागरूक नहीं हुई तो आगे भी झुकती रहेगी। सबसे बड़ी बात ये है सरकारी कर्मचारी इस बढ़ोतरी से भी संतुष्ट नहीं हैं और हड़ताल पर जाने की धमकी दे रहे हैं.

सामान्य जनता तो सरकारी कर्मचारियों के रवैय्ये से वैसे ही नाखुश है, उन्हें लगता है की वे काम तो कम करते हैं और वेतन-सुविधाएँ अधिक लेते हैं. अब जनता को ही जागरूक हो कर इस प्रवृत्ति का मुखर विरोध करना होगा और अपने जन-प्रतिनिधियों को इसके विरुद्ध संसद और विधान सभाओं में आवाज उठने के लिए मजबूर करना होगा।

आर्थिक प्रगति के लिए शिक्षा जरुरी साक्षरता नहीं


Suggestions to PMO 9: Jobs in Organized sector vs Unorganized sector in India

सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच

फोटो: By மா.ராஜ் (Own work) [CC BY-SA 4.0 (http://creativecommons.org/licenses/by-sa/4.0)], via Wikimedia Commons

Tuesday, 28 June 2016

आर्थिक प्रगति के लिए शिक्षा जरुरी साक्षरता नहीं


जी हाँ, आर्थिक प्रगति के लिए शिक्षा जरुरी है साक्षरता नहीं। शिक्षित व्यक्ति अपनी आय का साधन बढ़ा सकता है और आये हुए धन को सहेज कर अमीर भी बन सकता है परन्तु केवल साक्षर व्यक्ति ये काम नहीं कर सकता। यहाँ शिक्षा और साक्षरता का अंतर समझना बहुत जरुरी है. शिक्षा का अर्थ है किसी उपयोगी कल को सीखना जबकि साक्षरता केवल मात्र अक्षर ज्ञान है.

मध्यप्रदेश की ग्रामीण महिलाएं दक्षता विकास कार्यक्रम में मुस्कराते हुए 
अंग्रेजों ने बड़ी चालाकी से शिक्षा को साक्षरता का पर्यायवाची बन दिया था. प्राचीन काल से ही भारत में शिक्षा पर जोर था और यहाँ के व्यक्ति ज्ञान विज्ञानं के क्षेत्र में काफी प्रगति कर चुके थे. इसी कारण उस समय भारत आर्थिक रूप से भी बहुत समृद्ध था. परन्तु उस समय लिखने और पढ़ने पर बहुत जोर नहीं था. वेद, जैन आगम और बौद्धों का त्रिपिटक, जो की ज्ञान विज्ञानं का खजाना था उन्हें हज़ारों वर्षों तक लिखा नहीं गया था, उन्हें कंठस्थ किया जाता था.

जब अंग्रेजो ने भारत पर अधिकार किया तब उन्हें लगा की शिक्षित और आर्थिक रूप से समृद्ध इस देश को ज्यादा दिन गुलाम बनाए रखना संभव नहीं। इसलिए उन्होंने एक चाल चली. "शिक्षा" को "साक्षरता" में बदल दिया, और इस प्रकार भारत की अधिकांश शिक्षित जनता निरक्षर घोषित हो गई. अंग्रेजों ने साक्षरता को बढ़ावा दिया, उन्हें अच्छी नौकरी दी और गुलामों की फौज तैयार कर दी. वास्तविक शिक्षित व्यक्ति का सन्मान नष्ट हो गया. उसके साथ ही भारत की आर्थिक प्रगति भी रुक गई और एक बेहद समृद्ध देश गरीबी के गर्त में समां गया.

Narendra Modi, Rajnath Singh and Ram Naik in Lucknow
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री राजनाथ सिंह व राज्यपाल राम नाईक लखनऊ में दक्षता प्रमाण पत्र देते हुए 
दुर्भाग्य से स्वतंत्रता के बाद भी हम अंग्रेजों की बनाई हुई (लार्ड मैकाले) शिक्षा व्यवस्था को ही ढोते रहे और हमारे विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों ने (शिक्षित?) बेरोजगारों की फौज खड़ी कर दी. इन तथाकथित शिक्षण संस्थानों से प्रति वर्ष लगभग १ करोड़ विद्यार्थी निकलते हैं लेकिन उनमे से अधिकांश रोजगार पाए लायक नहीं होते. उन्हें साक्षर जरूर बनाया जाता है परन्तु उनमे व्यवहारीक शिक्षा का नितांत अभाव होता है. स्वयं का व्यापार करना तो दूर प्रायः वे नौकरी करने लायक भी नहीं होते.

अभी हाल में ही जारी मानव पूंजी सूचकांक (Human Capital Index) की विश्व सूचि में भारत १०५ वे स्थान पर है जो की बहुत ही नीचे की ओर है. इस सूचकांक में ऊपर की ओर बढ़ने के लिए शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है. शिक्षा जब तक व्यवहारिक व रोजगारोन्मुखी नहीं होगी हम इस सूचकांक में अच्छा सतहन नहीं प्राप्त कर सकेंगे.

इन तथाकथित शिक्षण संस्थानों में से सरकारी संस्थानों में जनता की गाढ़ी कमाई का खरबों रूपया बर्बाद होता है और निजी शिक्षण संस्थायें एवं कोचिंग इंस्टिट्यूट खरबों रुपये का व्यापारी लाभ कमाती है. इससे भी बड़ी बीमारी ये है की अधिकांश माता-पिता डिग्री एवं नंबरों के मोह में पड़ कर अपना पैसा और बच्चों का भविष्य बर्बाद कर देते हैं.

डिग्री और नंबर के मोह में पड़े बिना यदि इन छात्रों को व्यवहारिक, जीवनोपयोगी, एवं रोजगारोन्मुखी शिक्षा दी जाये तो उनमे कार्यकुशलता बढ़ेगी और अच्छा रोजगार मिलेगा। उनमे व्यावसायिक दक्षता का विकास होगा। उनमे से ही उद्यमी, प्रवन्धक, व्यापारी आदि निकलेंगे और वे अन्य युवाओं को नौकरी भी देंगे। इस तरह से देश आर्थिक प्रगति की राह पर तेजी से आगे निकलेगा।

एंड्राइड एप्लिकेसन डेवलपमेंट में अपार सम्भावनाएं


सादर,
ज्योति कोठारी,
संयोजक, जयपुर संभाग,
प्रभारी, पश्चिम बंगाल,
नरेंद्र मोदी विचार मंच

चित्र १: By McKay Savage from London, UK (smiles and determination of rural Indian women #1) [CC BY 2.0 (http://creativecommons.org/licenses/by/2.0)], via Wikimedia Commons

Sunday, 26 June 2016

NSG में भारत की राह रोकनेवाले चीन को सबक सिखाना जरूरी


NSG में भारत की राह रोकनेवाले चीन को सबक सिखाना जरूरी है. NSG अर्थात परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में कुल ४८ देश हैं जिनमे अमरीका, रूस, फ़्रांस सहित ४२ देशों ने भारत के प्रवेश का समर्थन कर दिया था. केवल चीन ने ही भारत विरोध का अपना अड़ियल रूख कायम रखा. अमरीका ने तो वाकायदा सभी सदस्य देशों को पत्र लिख कर भारत का समर्थन करने  अनुरोध किया था.


Updated map of the governments participating in the Nuclear Suppliers Group

शुरू में कुछ देश भारत का विरोध कर रहे थे परन्तु प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के बाद स्वीजरलैंड एवं मेक्सिको ने भारत का समर्थन कर दिया था. अंतिम दिन तो ऑस्ट्रिया, न्यूज़ीलैंड, तुर्की आदि देश भी नरम पड़ गए थे. परन्तु प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के अनुरोध के वावजूद चीन के राष्ट्रपति जिन पिंग ने अपना रवैय्या नहीं बदला और भारत विरोध की नीति पर कायम रहे.

NSG अर्थात परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में किसी नए राष्ट्र का प्रवेश सर्वसम्मति से ही हो सकता है और अकेले चीन के विरोध के कारण भारत इसका सदस्य नहीं बन पाया। अभी दो-तीन रोज पूर्व दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में NSG सदस्य देशों की बैठक हुई थी. दक्षिण कोरिया ने अपने मेजबान होने का फ़र्ज़ अदा करते हुए सदस्य देशों में सहमति बनाने का भरपूर प्रयास किया।

कल अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने एक बयान जरी कर कहा है की भारत को NSG की सदस्यता दिलाने के लिए अमरीका पूरा प्रयास करेगा और यह सुनिश्चित करेगा की इस वर्ष के अंत तक भारत को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह की सदस्यता मिल जाए. यह नरेंद्र मोदी जी के कूटनीतिक प्रयासों की सफलता है.

हम भारत की जनता को भी इस प्रयास में अपनी भूमिका निभानी है और चीन को सबक सीखाना है. अर्थनीति रूप से चीन पर चोट करना है और उसके लिए चीनी सामानों का बहिष्कार आवश्यक है. यदि भारत के लोग चीनी सामान खरीदना बंद कर दें तो पहले से ही मंदी से जूझ रहे चीनी उद्योगों को भारी झटका लगेगा. उनके बहुत से उद्योग तो बंद ही हो जायेंगे ऐसी स्थिति में चीन को भारत विरोध की अपमी नीति त्यागने को मज़बूर होना पड़ेगा।

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Regards,
Jyoti Kothari
Convener, Jaipur division
Prabhari, West Bengal,
Narendra Modi Vichar Manch